Chandragupta maurya episode 105 to 124
अब तक आपने देखा कि चंद्रगुप्त गंधार के राजा अम्बिक कुमार को मारकर गंधार का राजा बन जाता है। और दूसरी तरफ भदरसाल तक्षशिला में आचार्य सुखदेव के साथ मिलकर अपनी हार का बदला लेने के लिए चंद्रगुप्त से मौके की तलाश में होता है चाणक्य को उनके सूत्रों से भदरसाल द्वारा चंद्रगुप्त के खिलाफ साजिश का पहले से ही पता चल जाता है। इसलिए चाणक्य भदर साल को भ्रम जाल की स्थिति में फंसाने का प्रयास करते हैं। और चाणक्य भद्रसाल को तक्षशिला में ही रोके रखने का प्रयास करता है।वह जब भदरसाल चंद्रगुप्त को मारने के लिए उसके महल में आता है तो चंद्रगुप्त की सेना भद्रसाल को बंदी बना लेती हैं। दूसरी तरफ चंद्रगुप्त अमात्य राक्षस से उनकी राज मुद्रिका का छाप ले लेता है ।जिससे कि वह भविष्य में उसका प्रयोग करके उसका फायदा उठा सकें। इस तरह चाणक्य जानता था कि उनके शत्रु बेहद ही चतुर और कूटनीति में माहिर है। इसलिए चाणक्य ने भी धनानंद को पराजित करने के लिए साम , दाम , दंड , भेद की नीति के तहत चंद्रगुप्त को आगे बढ़ाते हुए उसे मगध का वह अखंड भारत का सम्राट बनाने के लिए अपने कदम बढ़ाए। एक कार्य को पूरा करने के बाद अमात्य राक्षस वापस मगध लौट रहा होता हैं। मगध लौटने के समय चाणक्य के द्वारा भदर साल के नाम से अमात्य राक्षस को एक पत्र लिखा जाता हैं। वह पत्र में यह लिखता है कि वह चंद्रगुप्त को मारने के लिए क्या करने वाला है तथा इसके लिए उसे अमात्य राक्षस की सहायता की जरूरत पड़ेगी। भद्रसाल के पत्र मिलने के बाद अमात्य रास्ते से वापिस लौटकर भद्र साल की मदद करने की तरफ निकल पड़ते हैं। दूसरी तरफ चंद्रगुप्त राज मुद्रिका की सहायता से धनानंद को अमात्य के नाम से पत्र लिखकर मगध की विशाल सेना को तक्षशिला भूला लेता हैं। मगध की सेना तक्षशिला की तरफ कुच करती है। लेकिन चाणक्य के द्वारा पहले से ही एक भुने हुये जाल में फंस जाती हैं।दरअसल चाणक्य भदर साल , अमात्य राक्षस ओर मगद की विशाल सेना को तक्षशिला में बुला लेता है और वह खुद और चंद्रगुप्त अपनी विशिष्ट सेना की टुकड़ी को लेकर मगध में धनानंद पर हमला कर देते है और उसे मार देते हैं इस तरह मगध पर चंद्रगुप्त का शासन होता है।
इस तरह समाप्त होती हैं चंद्रगुप्त और चाणक्य की जोड़ी की ये महान कहानी..........chandragupta maurya episode 106
चंद्रगुप्त धनानंद को पाटलिपुत्र में मार मगध साम्राज्य का शासक बन जाता हैं। इसके उपरांत चंद्रगुप्त के लिए अब आगे की राह इतनी आसान नही थी। एक तरफ़ जहाँ उसे अन्य छोटे प्रान्तों को मगध में सम्मलित करके अखंड भारत का निर्माण करना था। वहीं दूसरी तरफ़ दशकों से शोषित पीड़ित प्रजा की सेवा करनी थीं। पर इन सब चीजों को भी चंद्रगुप्त ने अपने गुरु चाणक्य की मदद से भलि भांति पूरा कर लिया पर चंद्रगुप्त औऱ चाणक्य के सामने अब जो एक बड़ी समस्या आकर ये खड़ी हो गयी थी कि चंद्रगुप्त धनानंद को मारकर मगध का शासक तो बन गया था मगर किसी तरह अमात्य राक्षस उनके बंधन में नही आ सका। चाणक्य ये जानते थे कि अमात्य राक्षस के होते हुए वे चंद्रगुप्त के एक बड़ा खतरा हैं और अमात्य चंद्रगुप्त को मारने की साज़िश कर सकते हैं। दूसरा अमात्य पूरे मगध में एक सबसे होशियार व अच्छे मंत्री थे जिनकी चंद्रगुप्त को शासन चलाने के लिए बहुत आवश्यकता थी। इसलिए चाणक्य चाहते थे कि वे आमात्य को मनाकर उन्हें चंद्रगुप्त का मंत्री बना थे जिससे कि चंद्रगुप्त अच्छे से शासन कर सकें।
अपने गुरु चाणक्य के कुशल मार्गदर्शन में चन्द्रगुप्त मौर्य ने नंद वंश के अंतिम सम्राट घननंद को पराजित कर दिया और मगध का सम्राट बन गया। युद्ध में नंद राज्य के मंत्री और सेनापति या तो मारे गए या बंदी बना लिए गए परन्तु प्रधान अमात्य राक्षस उनके हाथ नहीं आया। अपने स्वामी घननंद के प्रति सेवकभाव रखते हुए वह किसी दूर प्रदेश में जाकर चन्द्रगुप्त मौर्य के विरुद्ध षडयंत्र करने लगा। राक्षस बहुत ही कुशल और योग्य प्रशासक था। उसी के बल पर मगध एक शक्तिशाली राज्य बन चुका था।
चाणक्य जब अपनी कूटनीति और सैनिकबल से राक्षस को पकड़ने में असफल हो गए तो उन्होंने राक्षस के परममित्र सेठ चंदनदास को मृत्युदंड देने की घोषणा कर दी। इस घोषणा को सुनकर राक्षस से रहा नहीं गया और वह उसके प्राण बचने के लिए वधस्थल पर जा पहुंचा और आत्मसमर्पण करके अपने मित्र चंदनदास को मुक्त करने की याचना की।
राक्षस के आने का समाचार सुनकर चन्द्रगुप्त और चाणक्य वहां पहुँच गए। राक्षस ने उनके सामने भी अपना अनुरोध दुहराया।
राक्षस का बुद्धिकौशल, उसकी नीतिकुशलता, प्रशासकीय योग्यता और कूटनीतिक चातुर्य का चाणक्य भी लोहा मानते थे। उन्होंने राक्षस से विनम्रतापूर्वक कहा – “अमात्य, हमारी दृष्टि में आपने मगध राज्य के विरुद्ध षडयंत्र किये हैं पर हम आप जैसे योग्य मंत्री को खोना नहीं चाहते। मगध राज्य की उन्नति के लिए जिस कर्मठता और सेवाभाव से आपने अनीतिक और क्रूर शासक घननंद के लिए कार्य किये हैं उसी प्रकार यदि आप सुयोग्य और नीतिपरक चन्द्रगुप्त के लिए प्रधान अमात्य का पद स्वीकार कर लें तो आपके मित्र के प्राण बच सकते हैं।
अपने मित्र के प्राण की रक्षा के लिए राक्षस के सम्मुख और कोई उपाय नहीं था। मगध राज्य के हित के लिए भी उसे चाणक्य का अनुरोध स्वीकार करना पड़ा. राक्षस द्वारा पद संभालने के बाद चन्द्रगुप्त मौर्य को अपने विराट साम्राज्य में कुशल प्रशासन की स्थापना में कोई कठिनाई नहीं आई।
पूरे भारत का साम्राट बनने के बाद चंद्रगुप्त के जीवन का आख़िरी सबसे बड़ा युद्ध सिंकंदर के सेनापति सेलुयकस से हुआ। सिकंदर के वक़्त भारत छोटे छोटे टुकड़ों में बंटा हुआ था। मगर चंद्रगुप्त के सम्राट बनने के बाद पूरा भारत एक था। सेलुयकस के साथ चंद्रगुप्त का भीषण युद्ध हुआ। जिसमें चंद्रगुप्त जीत गया। सेलुयकस ने हारने के बाद अपनी पुत्री हेलना का विवाह चंद्रगुप्त के साथ कर दिया। और वो मेसोपोटामिया वापिस लौट गया।
इन सबके बाद चाणक्य चंद्रगुप्त ओर सब कुछ छोड़कर जंगल की तरफ़ चले जाते है। औऱ आख़िरी समय वो जंगलो में बिताते हुए अपनी पुस्तक अर्थशास्त्र को लिखने में बिताते है। इसके पश्चात अमात्य राक्षस दुर्दरा का विवाह चंद्रगुप्त के साथ करा देते हैं। एक अच्छा शासन चलाने के बाद चंद्रगुप्त भी सन्यासी बन जाते है और राजपाठ को त्याग देते हैं।
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